कन्धों पर भारी है सर

दुहरी होने लगी कमर |
कन्धों पर भारी है सर |

राम-राम आदाब बंद हैं
धर्मों में बँट गया शहर |
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इक पत्थर सा कुछ

खिड़कियाँ, दरवाज़े, छत कुछ भी नहीं
यह हमारे घर-सा कुछ रखा हुआ है |

आदमी से आदमी मिलता है पर
बीच में इक डर सा कुछ रखा हुआ है |

गीत बनने की प्रतीक्षा में युगों से
कंठ में इक स्वर सा कुछ रखा हुआ है |

शख्सियत  का तो पता कुछ भी नहीं
द्वार पे नंबर सा कुछ रखा हुआ है |

हाँ में ही इसको हिलाना है अगर
देह पर क्यूँ सर सा कुछ रखा हुआ है |

बिजलियाँ कड़कें, कभी सूरज तपे
सर पे इक अम्बर सा कुछ रखा हुआ है |

ज़िन्दगी बीती है जिसको तोलते
दिल पे इक पत्थर सा कुछ रखा हुआ है |

९-फरवरी-१९९५

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मुक्त व्यापार

सारा खेल उधार हो गया |
घर भारत सरकार हो गया |

उन्हें मुनाफ़ा हमको घाटा
यह कैसा व्यापार हो गया |
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सिर्फ़ प्रयास


जब तक तेरे पास रहे |
एक सुखद एहसास रहे |

मुस्काते ही आँसू आए
महफ़िल में उपहास रहे |

मन में अम्बर का सपना ले
पैर तले की घास रहे |

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कोई दीप जलाये रखना


बनी हवेली उनके मन की |
लेकिन जगह नहीं आँगन की |

कोई दीप जलाए रखना
जब जब चलें हवाएँ सनकी |

बेर झूमते हैं मस्ती में
देह चिर रही कदली-वन की | *

जब महका साँपों ने घेरा
कैसी किस्मत है चंदन की |

कौन किसी का दुःख-सुख पूछे
सबको चिंता अभिनन्दन की |

क्या-क्या नाच नचाती हमको
अभिलाषा उनके दर्शन की |

२५-दिसम्बर-१९९४

* कहु रहीम कैसे निभे, केर-बेर कर संग | वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग || (रहीमजी का दोहा)

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